हयात-ए-मदीना सिर्फ़ एक वेबसाइट नहीं है, न ही यह कोई प्रोजेक्ट है। इसे आप अपना ऐसा दोस्त समझिए, जो आपका सच्चा ख़ैरख़्वाह है, जो हमेशा आपकी बेहतरी चाहता है और जिसके सामने आप अपने दिल की हर बात कह सकते हैं।
हयात-ए-मदीना क्या है?
जैसा कि इसके नाम से ही ज़ाहिर है, हयात-ए-मदीना का अर्थ है—मदीना में रहने वालों जैसी ज़िंदगी। यह नाम अल्लाह तआला के साथ एक ख़ास और निजी रिश्ते की निशानी है।
पाक मदीना जैसी मुक़द्दस नगरी में रहना अपने आप में बहुत बड़ी नेमत है। लेकिन सवाल यह है कि मदीना में रहकर कैसी ज़िंदगी गुज़ारी जा सकती है? अल्लाह से कैसा रिश्ता बनाया जा सकता है और उस रिश्ते की रौशनी में अपनी ज़िंदगी को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है?
इन्हीं सवालों के जवाब आपको यहाँ, “हयात-ए-मदीना” में मिलेंगे।
पृष्ठभूमि
आज के दौर में इंसानों की एक बड़ी तादाद अपनी असली फ़ितरत से दूर हो चुकी है। इंसान अपने अल्लाह से, अपने पैदा करने वाले से दूर होकर ऐसे रास्तों पर निकल पड़ा है, जो उसे उसकी रूहानी सच्चाई से दूर ले जाते हैं।
यह एक ऐसी हक़ीक़त है कि जब इंसान अपनी फ़ितरत से दूर होता चला जाता है, तो उसका अपनी असली प्रकृति से रिश्ता कमज़ोर होने लगता है। और जब यह रिश्ता कमज़ोर पड़ता है, तो ज़िंदगी में ऐसी चीज़ें हावी होने लगती हैं, जो इंसान के स्वभाव, उसकी रूह और उसकी असलियत से मेल नहीं खातीं।
ऐसे में अगर इंसान फिर से अपनी फ़ितरत की ओर लौटे, अपने ख़ालिक़ की तरफ़ ध्यान दे और अपने अल्लाह की ओर रुजू करे, तो उसे जो सबसे बड़ी दौलत और सबसे पहला तोहफ़ा मिलता है, वह है दिल का सुकून।
जब मैंने सोचा कि अल्लाह से सीधे जुड़ना तो इतना आसान है, फिर इंसान इस रास्ते की ओर क्यों नहीं बढ़ता, तो मेरे दिल में यह ख़याल आया कि आज के इंसान को इस ओर ध्यान दिलाने की ज़रूरत है।
जब मैंने इस विषय पर थोड़ा और ग़ौर किया, कुछ और जानने-समझने की कोशिश की, तो मुझे इस रास्ते की समझ आने लगी।
बस, यही ख़याल और यही ख़्वाहिश कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों, ख़ास तौर पर नौजवानों को अल्लाह के साथ एक सादा, आसान और मज़बूत रिश्ता बनाना चाहिए, हयात-ए-मदीना की बुनियाद बनी।
मेरी दिली ख़्वाहिश है कि इंसान अपने रब से ऐसा रिश्ता बनाए, जिसमें उसे किसी दिखावे की ज़रूरत न हो, किसी मुश्किल रस्म की पाबंदी न हो, बल्कि वह अपने दिल के साथ अपने अल्लाह की ओर लौट सके और उसकी रहमत से अपने जीवन को बेहतर बना सके।
हयात-ए-मदीना के बुनियादी उद्देश्य
- इंसान का अपने ख़ालिक़ यानी पैदा करने वाले के साथ रिश्ता मज़बूत बनाना।
- दिल का सुकून हासिल करना।
- इंसान के भीतर ख़ुद को पहचानने और समझने की भावना जगाना।
- अल्लाह तआला तक पहुँचने के सबसे आसान रास्तों को तलाश करना।
- क़ुरआन पाक, अहादीस-ए-मुबारका और आधुनिक दौर की वैज्ञानिक खोजों की रौशनी में ख़ुद को एक सकारात्मक बदलाव के लिए तैयार करना।
- बिना किसी निजी लाभ की चाह के, अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से अपने आस-पास के लोगों की मुश्किलें कम करना और दूसरों की ज़िंदगी में आसानी और ख़ुशियाँ बाँटना।
हयात-ए-मदीना का केंद्रीय विचार
अल्लाह तआला क़ुरआन पाक में फ़रमाते हैं:
أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَتَكُونَ لَهُمْ قُلُوبٌ يَعْقِلُونَ بِهَا…
“क्या उन्होंने धरती में घूम-फिरकर नहीं देखा, ताकि उनके ऐसे दिल होते जिनसे वे सोचते और समझते… हक़ीक़त यह है कि आँखें अंधी नहीं होतीं, बल्कि वे दिल अंधे हो जाते हैं, जो सीनों में होते हैं।”
सूरह अल-हज्ज़, आयत 46
लंबे समय तक विज्ञान की दुनिया में इस्लाम की इस बात को स्वीकार नहीं किया जाता था कि दिल का भी सोचने, समझने और निर्णय लेने की प्रक्रिया से कोई संबंध हो सकता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह था कि दिल का काम केवल शरीर में ख़ून पंप करना है, जबकि इंसान की सोचने-समझने की तमाम गतिविधियाँ उसके दिमाग़ से संबंधित होती हैं, जो उसकी खोपड़ी के भीतर मौजूद है।
लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक और चिकित्सकीय शोध, ख़ास तौर पर Neurocardiology के क्षेत्र में होने वाले अध्ययनों से यह सामने आया है कि दिल के पास अपना एक तंत्रिका तंत्र भी होता है, जिसमें न्यूरॉन्स शामिल हैं। यह तंत्रिका तंत्र दिमाग़ के साथ संकेतों का आदान-प्रदान करता है और भावनाओं तथा कुछ निर्णय-संबंधी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।
यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है कि आधुनिक विज्ञान ने दिल के शाब्दिक अर्थ में इंसान की तरह सोचने का प्रमाण नहीं दिया है। लेकिन दिल और दिमाग़ के बीच मौजूद इस जटिल संबंध ने इंसानी भावनाओं, अनुभूतियों और निर्णयों को समझने के नए रास्ते ज़रूर खोले हैं।
इस्लाम में दिल की जो अहमियत बयान की गई है, वह केवल शरीर के एक अंग तक सीमित नहीं है। दिल इंसान की आंतरिक दुनिया, उसकी समझ, उसकी नीयत और उसकी रूहानी हालत का भी प्रतीक है।
इसी संदर्भ में एक हदीस-ए-मुबारका है:
عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْعَاصِ، أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ:
«إِنَّ قُلُوبَ بَنِي آدَمَ كُلَّهَا بَيْنَ إِصْبَعَيْنِ مِنْ أَصَابِعِ الرَّحْمَنِ، كَكَلْبٍ وَاحِدٍ، يُصَرِّفُهُ حَيْثُ يَشَاءُ»
ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:
«اللَّهُمَّ مُصَرِّفَ الْقُلُوبِ صَرِّفْ قُلُوبَنَا عَلَى طَاعَتِكَ»
अनुवाद:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“आदम की तमाम औलाद के दिल रहमान की उँगलियों में से दो उँगलियों के बीच एक दिल की तरह हैं। वह उन्हें जिधर चाहता है, फेर देता है।”
फिर आप ﷺ ने यह दुआ फ़रमाई:
“ऐ दिलों को फेरने वाले अल्लाह! हमारे दिलों को अपनी इताअत और फ़रमाँबरदारी की ओर फेर दे।”
(सहीह मुस्लिम: 2654 — मूल अरबी पाठ ऊपर ज्यों का त्यों रखा गया है।)
इस हदीस से हमें यह एहसास होता है कि इंसान के दिल का अल्लाह की ओर मुड़ना, उसके भीतर अल्लाह की मोहब्बत और इताअत की चाह पैदा होना, अल्लाह तआला का एक ख़ास करम है।
जब इंसान का दिल अपने रब की ओर मुतवज्जेह होता है, तो उसके सोचने का अंदाज़ बदलने लगता है। उसकी प्राथमिकताएँ बदलती हैं, उसकी नीयत में बदलाव आता है और धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी भी एक नई दिशा में आगे बढ़ने लगती है।
हयात-ए-मदीना का केंद्रीय विचार यही है कि इंसान का दिल अल्लाह की ओर मुतवज्जेह हो और इस रूहानी रुझान की बुनियाद पर अल्लाह के साथ एक ख़ास, सच्चा और मज़बूत रिश्ता क़ायम हो।
हयात-ए-मदीना की तमाम बातें, तमाम लेख और तमाम रहनुमाई इसी केंद्रीय विचार के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
हमारा मक़सद केवल आपको कुछ नई बातें बताना नहीं है, बल्कि आपको अपने भीतर झाँकने, अपने रब से जुड़ने और अपनी ज़िंदगी में ऐसी सकारात्मक तब्दीली लाने के लिए प्रेरित करना है, जिसका असर आपकी अपनी ज़िंदगी के साथ-साथ आपके परिवार और आपके आस-पास के लोगों पर भी पड़े।
हयात-ए-मदीना से आप क्या हासिल कर सकते हैं?
1. एक बेहतर और सुकून भरी ज़िंदगी
बिना किसी बड़ी जद्दोजहद के, धीरे-धीरे अपनी जीवनशैली में ऐसे बदलाव लाना, जो आपको ख़ुशी, संतोष और दिल का सुकून दे सकें।
2. नेक रास्ते पर चलने की आसान शुरुआत
ऐसी छोटी-छोटी बातों को जानना और समझना, जिन पर अमल करके आप उस रास्ते पर अपना पहला क़दम रख सकते हैं, जिस पर अल्लाह के नेक और प्यारे बंदे चलते हैं।
3. छोटी-छोटी नेकियों की बड़ी दौलत
बहुत आसान और मामूली कोशिशों से ऐसी नेकियाँ करना, जो आपके नेक आमाल में जुड़ती जाएँ और इंशाअल्लाह, क़ियामत के दिन आपके लिए भलाई का ज़रिया बनें।
4. अपने परिवार के लिए ख़ुशी और सुकून का कारण बनना
हयात-ए-मदीना से जुड़कर आप अपने माता-पिता, भाई-बहनों, जीवनसाथी और बच्चों के लिए एक बेहतर, प्यार करने वाले और सुकून देने वाले साथी बन सकते हैं।
कभी-कभी हमारी छोटी-सी बात, हमारा थोड़ा-सा धैर्य, हमारी नरमी और हमारा अपनापन किसी अपने के लिए बहुत बड़ी ख़ुशी बन जाता है। हम चाहते हैं कि आपकी ज़िंदगी में ऐसी ख़ूबियाँ बढ़ें और आपके अपने आपके साथ ख़ुद को महफ़ूज़, ख़ुश और ख़ास महसूस करें।
5. अल्लाह से अपने दिल की बात कहने का आसान तरीक़ा
अल्लाह तआला से सीधे बात करने, अपने दिल का हाल बयान करने, अपनी परेशानियाँ उनके सामने रखने और उनसे रहनुमाई माँगने के बेहद सादे और आसान तरीक़ों को जानना।
आप अपने अल्लाह से अपने दिल की हर बात कह सकते हैं। अपनी ख़ुशी, अपना ग़म, अपनी परेशानी, अपना डर, अपनी उम्मीदें और अपनी ख़्वाहिशें—सब कुछ उनके सामने रख सकते हैं।
6. ख़ुद को पहचानने की दौलत
अपने भीतर झाँकना, अपने विचारों और भावनाओं को समझना, अपनी कमज़ोरियों को पहचानना और अपनी अच्छाइयों को निखारना। क्योंकि जब इंसान ख़ुद को समझने लगता है, तो वह अपनी ज़िंदगी को बेहतर दिशा देने के लिए भी तैयार होने लगता है।
आइए, हयात-ए-मदीना से जुड़िए!
हयात-ए-मदीना का सदस्य बनना बिल्कुल मुफ़्त है।
यहाँ न कोई ज़बरदस्ती है, न कोई दबाव और न ही किसी तरह की पाबंदी। हम आपको जो भी बताएँगे, जो भी समझाने की कोशिश करेंगे, अगर आपका दिल चाहे तो उस पर अमल कीजिए। अगर किसी बात पर आपका दिल राज़ी न हो, तो उसे छोड़ दीजिए।
हमारी आपसे बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है—हमसे जुड़े रहिए। इस रिश्ते को टूटने मत दीजिए।
क्योंकि आप हमारे अपने हैं। आप हमारे भाई हैं, हमारी बहनें हैं और हमें बहुत अज़ीज़ हैं।
हम नहीं चाहते कि आप किसी दबाव में आकर हमसे जुड़ें। हम तो बस चाहते हैं कि जब भी आपको अपने दिल की बात कहने की ज़रूरत महसूस हो, जब भी आप कुछ अच्छा जानना या सीखना चाहें, जब भी आपका मन अल्लाह की ओर लौटने का हो, तो आपको याद आए कि यहाँ एक ऐसा दोस्त मौजूद है, जो आपकी बेहतरी चाहता है।
यहाँ आने के लिए कोई ख़ास वक़्त तय नहीं है। जब चाहें आइए, जितनी देर चाहें ठहरिए और जब चाहें वापस जाइए।
इस दिल के दरवाज़े और इस घर के दरवाज़े आपके लिए हमेशा खुले मिलेंगे।
हमारी ख़्वाहिश है कि इस सफ़र में हम एक-दूसरे के लिए आसानी का कारण बनें, एक-दूसरे को अच्छाई की ओर प्रेरित करें और मिलकर ऐसी ज़िंदगी की तरफ़ बढ़ें, जिसमें अल्लाह की याद हो, दिल का सुकून हो, इंसानों के लिए मोहब्बत हो और दूसरों के लिए आसानी पैदा करने का जज़्बा हो।
अल्लाह तआला हम सबके दिलों को अपनी ओर फेर दे, हमें अपनी मोहब्बत और रहमत से नवाज़े और हमें एक-दूसरे के लिए ख़ैर और भलाई का ज़रिया बना दे। आमीन।
आपका अपना,
मुअज़्ज़म शाह
